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पैदा होने के 7 साल पहले ही बन गए पटवारी मध्यप्रदेश का अजब गजब विभाग भू-अभिलेख विभाग

पैदा होने के 7 साल पहले ही बन गए पटवारी

मध्यप्रदेश का अजब गजब विभाग भू-अभिलेख विभाग

भोपाल - जी आप सही पड़ रहे है कि इंसान पैदा होने के 7 वर्ष पहले ही पटवारी बन गया, या फिर ऐसा कहें कि आदमी पटवारी के पद पर पदस्थ होकर ही पैदा हुआ..। यह कारनामा केवल ओर केवल मध्यप्रदेश में ही संभव है। यहां के भू अभिलेख विभाग की कार्यप्रणाली का आलम यह है कि कुछ पटवारियों को उनके पैदा होने के पहले ही पदस्थ कर दिया गया। ऐसा ही किसान सम्मान योजना में आधे अधुरे साफ्टवेयर पर बिना प्रशिक्षण के पटवारियो से काम करवा कर अनेकों किसानों को केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना से वंचित कर दिया। ओर तो ओर अब बाढ़ आपदा के समय अधकचरे साफ्टवेयर सारा से फसल क्षति का काम करवाने के आदेश जारी हुए है जिससे भी प्रदेश के हजारों किसान प्रभावित हो जायेंगे। 

➡️ देखिए किस तरह लापरवाही का आलम भू-अभिलेख में चल रहा है - मध्य प्रदेश भू अभिलेख एवं बंदोबस्त विभाग की लापरवाही का यह आलम है कि बरसों से पदोन्नति की राह देख रहे पटवारियों के लिए विभाग द्वारा प्रदेश स्तर पर ग्रेडिंग सूची तैयार की गई, जिसमें अब्बल दर्जे की लापरवाही करते हुए पहले ही नंबर पर दर्ज पटवारी को उसके पैदा होने से पहले ही पदस्थापना दे दी गई । सूची में क्रमांक एक पर दर्ज नाम भौमसिंह कुशवाह उनके जन्म के दिन दिनांक 03-08-1959 को ही पटवारी पद पर पदस्थ हो गए थे, दूसरे नंबर पर उल्लेखित पटवारी हीरालाल कोल उनके जन्म से 7 वर्ष पूर्व ही पटवारी पद पर पदस्थ हो गए थे। इसी प्रकार क्रमांक 3 को भी देखें क्रमांक 4 को भी देखें बड़ी अद्भुत सूची है। क्रमांक 4 पर संजय चोरे खंडवा से का जन्म तारीख 1971 व नियुक्ति दिनांक 1968 लिखा है, जबकि उनकी नियुक्ति वर्ष 1997 की है।

यह कोई एक - दो मामले नहीं है, पूरी सूची इसी प्रकार की गंभीर त्रुटियों से भरी हुई है और तो और प्रदेश के दर्जनों जिलों के पटवारियों को इस सूची में शामिल ही नहीं किया गया है। इस संबंध में पटवारियों द्वारा अधिकारियों को अवगत कराने पर उन्होंने इसे जिला स्तर की त्रुटि बताते हुए दावे आपत्ति की बात कही है। नाम सूची में छूट जाना तो जिला स्तर की गलती समझ आती है किंतु प्रदेश स्तरीय ग्रेडिंग लिस्ट में पहले क्रमांक से लेकर लगातार 2, 3, 4 नम्बरों पर गलती होना और ऐसी ही गलती अन्य पटवारीयों के साथ होना एक बड़ी भयंकर लापरवाही है, जो कि पटवारियों की पदोन्नति के राह में एक रुकावट तो है ही विभागीय कार्यप्रणाली का उच्च स्तर पर क्या आलम है यह भी प्रदर्शित करती है। इसके साथ ही मध्यप्रदेश के समस्त पटवारियो को भी सूची में सम्मिलित नहीं किया गया है।


➡️ आधे अधूरे ओर अधकचरे साफ्टवेयरों की वजह से योजनाओं के लाभ से वंचित किसान - मध्यप्रदेश सरकार फिर से वही गलती दोहराने जा रही है जो पूर्व में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के क्रियान्वयन के समय की गई थी। पहले सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के क्रियान्वयन के समय प्रदेश में मेप आईटी के साफ्टवेयर पर किसानों का डाटा संग्रहित करवाने का काम करवाया था। साफ्टवेयर पूर्ण विकसित नहीं होने की वजह से बार बार अपटेड किया जाता रहा ओर इसके चलते प्रदेश के सभी किसानों को आजतक उक्त योजना का लाभ नहीं मिल पाया है। अब सरकार फसल क्षति के मामले में सारा एप पर कार्य करवाने जा रही हैं। 

अगस्त माह में हुई अतिवृष्टि व कीट के प्रकोप से खराब हुई सोयाबीन, उड़द की फसलों के मौके पर सर्वे के पश्चात कृषकों को राहत राशि देने के लिए राजस्व विभाग के सारा (SAARA) एप्प पर क्षतिपत्रक बनाने का नया प्रयोग शासन द्वारा किया जा रहा है। जिसमें शुरुआत से ही खामियां नज़र आने लगी हैं, क्योंकि इसका कोई प्रशिक्षण सरकार द्वारा पटवारियों को नहीं दिया गया साथ ही पट्टेदारों, आयकरदाताओं, सेवाभूमि, शासकीय कर्मचारियों सहित जनप्रतिनिधियों तक का रिकॉर्ड सारा एप्प में उपलब्ध नहीं है । सहखातेदारों की स्थिति में उनका रकबा व नाम तक इसमें नहीं मिलता, वहीं नाबालिग व परिवार के नाम भूमि होने से सिर्फ मुखिया के नाम ही पीएम सम्मान निधि की पात्रता है। एक ही कृषक की एक से अधिक ग्रामों में भूमि होने पर एक ही जगह एंट्री होती है। जबकि फसल क्षति में इकाई बोया गया रकबा होता है। इन्ही ढेर सारी कमियों के कारण फसल क्षति सर्वे व क्षतिपत्रक का कार्य सारा एप्प पर किया जाना संभव नहीं है।

➡️ गिरदावरी के आंकडों में भी है गंभीर विसंगतियां, बंदोबस्त के रकबे से ज्यादा दर्ज है ग्रामों का रकबा - इस आधे अधूरे सॉफ्टवेयरों पर भू अभिलेख विभाग द्वारा काम करवाए जाने और ऑनलाइन डाटा में हुई गलतियों की वजह से गांव के कुल रकबे से ज्यादा रकबा दर्ज चला रहा है। इसके चलते काफी किसानों द्वारा फसल बीमा योजना सहित विभिन्न प्रकार के कृषि संबंधी शासकीय लाभ प्राप्त किए जा रहे हैं और इससे शासन को ही नुकसान हो रहा है। किंतु प्राइवेट वेंडरों से फीडिंग करवाए गए डाटा के सुधार की कोई कार्य योजना परिलक्षित नहीं हो रही है। प्रदेश भर में पटवारियों को अपने मूल विभागीय कार्यों से छोड़कर अन्य विभिन्न प्रकार के कार्यों में लगा दिया गया है। जिसके चलते पटवारी के मूल कार्य जमीन संबंधी अभिलेखों का संधारण व्यवस्थित रूप से नहीं हो रहा है । इसका खामियाजा किसानों की आपसी लड़ाई तो है ही सरकार को भी आर्थिक नुकसान हो रहा है।

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