मामला मुरैना, भिंड और राजगढ़ जिलों से जुड़ा है, जहां बाजार से खरीदा गया गेहूं फर्जी किसानों के नाम पर समर्थन मूल्य पर बेचकर करोड़ों रुपये का भुगतान लिया गया। प्रारंभिक जांच में 4.82 करोड़ रुपये के भुगतान में गड़बड़ी सामने आई है।
चार फर्जी किसान बने जांच के प्रमुख दोषी
पूरे मामले में चार फर्जी किसानों को प्रमुख आरोपी माना गया है। आरोप है कि इनके नाम पर फर्जी पंजीयन कराकर समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचा गया, जबकि इनके पास या तो कृषि भूमि नहीं थी या फिर दूसरे किसानों की जमीन के खसरा नंबरों का उपयोग कर पंजीकरण कराया गया। जांच में यह भी सामने आया कि इन फर्जी किसानों के खातों में करोड़ों रुपये का भुगतान किया गया। वहीं, इस पूरे मामले में चार फर्जी किसानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। प्रारंभिक जांच में यही चार फर्जी किसान पूरे घोटाले के प्रमुख पात्र माने जा रहे हैं, जिनके नाम पर फर्जी पंजीयन कर करोड़ों रुपये का समर्थन मूल्य प्राप्त किया गया।
जांच में सामने आया है कि चार फर्जी किसानों ने दूसरे किसानों की जमीन के खसरा नंबरों पर पंजीयन कराकर समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचा। कई मामलों में जिन किसानों की जमीन का उपयोग किया गया, उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं थी। इन फर्जी पंजीयनों के आधार पर सरकारी खरीद केंद्रों पर गेहूं बेचकर लगभग 4.82 करोड़ रुपये का भुगतान प्राप्त किया गया।
पटवारी किसान का मोहरा बने, भरोसा पड़ा भारी
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक चर्चा पटवारियों की भूमिका को लेकर हो रही है। राजस्व विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अधिकांश मामलों में पटवारी किसानों द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी और दस्तावेजों पर विश्वास कर फसल सत्यापन की प्रक्रिया पूरी करते रहे। इसी विश्वास का फायदा उठाकर कुछ लोगों ने फर्जी पंजीयन कराए और बाद में जब मामला सामने आया तो कार्रवाई की पहली मार पटवारियों पर पड़ी।
जानकारों का कहना है कि यदि जांच में यह साबित होता है कि पटवारियों ने जानबूझकर अनियमितता नहीं की, बल्कि उन्हें गुमराह कर फर्जी जानकारी उपलब्ध कराई गई, तो वास्तविक दोषियों की जिम्मेदारी और अधिक स्पष्ट होगी।
ऐसे सामने आया घोटाला
जांच में कई गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। पंजीयन की अंतिम तिथियों में देर रात तक फर्जी पंजीयन किए गए। दूसरे किसानों की भूमि के खसरा नंबरों पर पंजीयन कराया गया। पंजीयन एक स्थान पर हुआ, जबकि गेहूं दूसरी समिति में बेचा गया। समर्थन मूल्य की राशि फर्जी किसानों के खातों में पहुंचाई गई और विभागीय जांच शुरू होने के बाद भी भुगतान जारी रहा।
ईओडब्ल्यू और ईडी की जांच जारी
मामले का खुलासा होने के बाद आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने जांच शुरू की है, जबकि प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी पूरे भुगतान, पंजीयन और वित्तीय लेन-देन की जांच की तैयारी कर रहा है।
अभी और बढ़ सकती है कार्रवाई
प्रारंभिक जांच के आधार पर 15 पटवारियों को निलंबित किया गया है। 10 समिति प्रबंधकों और दो तहसीलदारों को नोटिस जारी किए गए हैं। प्रशासन का कहना है कि जांच में जो भी व्यक्ति दोषी पाया जाएगा, उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
कम समय में सत्यापन की प्रक्रिया बनी बड़ी चुनौती
जानकारों के अनुसार, गेहूं पंजीयन और फसल सत्यापन के दौरान पटवारियों को अत्यंत कम समय-सीमा में गूगल शीट के माध्यम से किसानों की जानकारी उपलब्ध कराई गई थी। उसी आधार पर बड़ी संख्या में फसलों का सत्यापन कराया गया। सीमित समय और उपलब्ध कराई गई जानकारी पर निर्भर रहने के कारण कई पटवारी इस पूरे मामले में उलझ गए। प्रारंभिक जांच से यह संकेत मिल रहे हैं कि वास्तविक लाभ उन फर्जी किसानों को मिला, जिन्होंने गलत जानकारी और फर्जी पंजीयन के माध्यम से समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचकर सरकारी राशि प्राप्त की। यही कारण है कि इस मामले में दर्ज एफआईआर का केंद्र भी फिलहाल चार फर्जी किसान हैं, जबकि जांच एजेंसियां पूरे नेटवर्क की भूमिका की पड़ताल कर रही हैं।
ऐसे हुआ पूरा घोटाला
- जांच में कई गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं—
- अंतिम दिनों में रातों-रात फर्जी पंजीयन: गेहूं पंजीयन की अंतिम तिथि 10 मार्च थी। अधिकांश संदिग्ध पंजीयन 5 से 10 मार्च के बीच देर रात से सुबह तक किए गए।
- दूसरों की जमीन पर पंजीकरण: पात्र किसानों की जमीन का उपयोग किए बिना अन्य किसानों के खसरा नंबरों पर फर्जी पंजीयन कर दिया गया। कई मामलों में संबंधित किसानों को इसकी जानकारी तक नहीं थी।
- एक जगह पंजीयन, दूसरी जगह बिक्री: पंजीयन एक समिति या ब्लॉक में कराया गया, जबकि गेहूं की तुलाई दूसरे खरीद केंद्रों पर कराई गई, जिससे गड़बड़ी छिपाई जा सके।
- फर्जी किसानों के खातों में भुगतान: दूसरे किसानों की उपज होने के बावजूद समर्थन मूल्य की राशि फर्जी किसानों के बैंक खातों में जमा कराई गई।
- जांच के बावजूद भुगतान नहीं रुका: संबंधित विभागों की जांच शुरू होने के बाद भी भुगतान की प्रक्रिया जारी रही और करोड़ों रुपये जारी कर दिए गए।
जांच एजेंसियों के अनुसार, फर्जी किसानों ने बाजार से कम कीमत पर गेहूं खरीदा और उसे समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद केंद्रों में बेच दिया। उस समय बाजार में गेहूं का भाव लगभग 2200 से 2400 रुपये प्रति क्विंटल था, जबकि सरकार ने 2600 रुपये प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य पर खरीदी की। इसी अंतर का फायदा उठाकर करोड़ों रुपये का अवैध लाभ लिया गया।


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