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"लोकायुक्त में ‘सेटिंग सिंडिकेट’ का भंडाफोड़! स्टिंग के बाद आरक्षक बर्खास्त, चालक की छुट्टी"

लोकायुक्त में ‘सेटिंग’ का खेल! ट्रैप केस प्रभावित करने के आरोप में आरक्षक बर्खास्त, संविदा चालक की सेवा भी खत्म, लोकायुक्त ने अपने ही कर्मियों पर चलाया डंडा

दैनिक भास्कर की स्टिंग रिपोर्ट के बाद लोकायुक्त का बड़ा एक्शन, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की साख पर उठे सवाल

भोपाल, 5 जून 2026। मध्यप्रदेश लोकायुक्त संगठन में कथित रूप से ट्रैप मामलों को प्रभावित करने और जांच की दिशा मोड़ने के आरोपों पर बड़ी कार्रवाई करते हुए लोकायुक्त मुख्यालय ने एक आरक्षक को तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त (Dismissal from Service) कर दिया है, जबकि एक संविदा वाहन चालक की सेवा समाप्त (Termination) कर दी गई है। यह कार्रवाई दैनिक भास्कर में प्रकाशित स्टिंग ऑपरेशन और वीडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर की गई जांच के बाद सामने आई है।

लोकायुक्त संगठन द्वारा जारी दो अलग-अलग आदेशों में स्पष्ट कहा गया है कि आरोपित कर्मचारियों का आचरण भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की विश्वसनीयता को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाला पाया गया। विभाग ने इसे सेवा नियमों के विपरीत और संगठन की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला कृत्य माना है।

क्या है पूरा मामला?

मामले की शुरुआत 3 जून 2026 को प्रकाशित एक डिजिटल समाचार और वीडियो रिपोर्ट से हुई। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि लोकायुक्त में हाल ही में हुई ट्रैप कार्रवाई से जुड़े आरोपियों के परिजन बनकर कुछ लोगों से संपर्क किया गया और कथित रूप से जांच तथा वॉयस सैंपल जैसी प्रक्रियाओं को प्रभावित कराने के नाम पर रकम की मांग की गई।

वीडियो सामने आने के बाद लोकायुक्त मुख्यालय भोपाल ने मामले को गंभीरता से लिया और संबंधित कर्मचारियों से स्पष्टीकरण मांगा।

संविदा चालक पर क्या आरोप लगे?

आदेश के अनुसार, संविदा वाहन चालक अमित विश्वकर्मा ने अपने स्पष्टीकरण में स्वीकार किया कि उसकी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई थी जिसने खुद को ट्रैप केस से जुड़ा बताया था।

जांच में सामने आया कि कथित बातचीत के दौरान—

  • वॉयस सैंपल की प्रक्रिया को लेकर सलाह दी गई।
  • जांच को प्रभावित करने की संभावनाओं पर चर्चा हुई।
  • संबंधित पक्ष को वरिष्ठ अधिकारियों से मिलने का रास्ता बताया गया।
  • केस में मदद के नाम पर संपर्क स्थापित कराया गया।

लोकायुक्त ने माना कि यह आचरण एक संविदा कर्मचारी के दायित्वों और सेवा नियमों के प्रतिकूल है। इसके बाद अमित विश्वकर्मा की संविदा सेवा तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गई।

आरक्षक पर लगे बेहद गंभीर आरोप

दूसरे आदेश में लोकायुक्त संगठन के आरक्षक यशवंत सिंह ठाकुर पर कहीं अधिक गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

आदेश के मुताबिक कथित बातचीत में आरक्षक द्वारा—

  • ट्रैप केस को प्रभावित करने के दावे किए गए।
  • वॉयस सैंपल और जांच प्रक्रिया को लंबा खींचने की बात कही गई।
  • आरएफएसएल और एफएसएल रिपोर्ट को प्रभावित कराने का दावा किया गया।
  • ट्रांस्क्रिप्ट और दस्तावेज मैनेज कराने जैसी बातें कही गईं।
  • लाखों रुपये खर्च होने की चर्चा की गई।
  • प्रभावशाली संपर्कों के जरिए जांच को प्रभावित करने का भरोसा दिलाया गया।

लोकायुक्त ने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध वीडियो सामग्री और तथ्यों से आरोप गंभीर प्रतीत हुए तथा ऐसे मामले में विभागीय जांच की आवश्यकता नहीं मानी गई।

अनुच्छेद 311 के तहत सीधी कार्रवाई

आदेश में उल्लेख किया गया है कि आरक्षक के खिलाफ कार्रवाई भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311(2)(ख) तथा मध्यप्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के तहत की गई।

लोकायुक्त के अनुसार स्टिंग ऑपरेशन की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए नियमित विभागीय जांच व्यावहारिक रूप से संभव नहीं थी। इसलिए विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए आरक्षक यशवंत सिंह ठाकुर को तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

लोकायुक्त की साख पर सवाल

आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि संबंधित कर्मचारियों के कथित कृत्यों से—

> “भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में जनता का विश्वास बुरी तरह प्रभावित हुआ है।”

लोकायुक्त ने माना कि जब भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाली एजेंसी के भीतर ही ऐसे आरोप सामने आते हैं, तो इससे संस्था की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

सबसे बड़ी बात

यह मामला इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि कार्रवाई किसी बाहरी शिकायत के बजाय मीडिया स्टिंग ऑपरेशन और वीडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर हुई है। लोकायुक्त ने स्वयं संज्ञान लेकर अपने ही कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई की है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाओं के भीतर जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा संदेश है कि जांच एजेंसियों में तैनात कर्मचारियों के लिए भी नियमों से ऊपर कोई नहीं है।

नोट: समाचार दस्तावेजों में दर्ज आरोपों और विभागीय आदेशों पर आधारित है। संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई प्रशासनिक आदेशों के आधार पर की गई है।



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