कार्यक्रम में मध्य भारत प्रांत के संगठन मंत्री निखिलेश माहेश्वरी, पर्यावरणविद् गौरीशंकर मुकाती, सुजीत शर्मा, चंद्रहास पाठक, निरंजन शर्मा, रामप्रसाद राजपूत, अनिरुद्ध तंवर, किरीट नागड़ा, मगनलाल धनगर, हरिशंकर सैनी, संदीप केकरे, आनंद सोनी, जगदीश विश्नोई, सरदार पटेल एवं घनश्याम यादव सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पर्यावरणविद् गौरीशंकर मुकाती ने कहा कि मानव सभ्यता का विकास सदैव नदियों के किनारे हुआ है पहले नदियां बारह महीने बहती थी पर अब जहां नदियों में पानी साफ हो रहा है वही पानी दूषित भी हो रहा है जिससे बचने की पहन करना होगी वर्तमान में बढ़ते तापमान के दुष्प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति ही हमारा जीवन है और बच्चों को बचपन से ही पर्यावरण एवं प्रकृति के प्रति जागरूक बनाना आवश्यक है, ताकि उनका प्रकृति और सनातन संस्कृति से गहरा जुड़ाव हो सके।
निखिलेश माहेश्वरी ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत की दृष्टि विश्व से भिन्न रही है। यहां नदियों को मां का दर्जा दिया गया है, वृक्षों में भी प्राण माने गए हैं तथा पर्वतों को देवता के रूप में पूजनीय माना गया है। उन्होंने कहा कि हमें अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीना चाहिए। उन्होंने खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए 363 लोगों के बलिदान का उल्लेख करते हुए पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पण का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि प्रकृति के सभी जीव अपने अस्तित्व के लिए संतुलित जीवन जीते हैं, केवल मनुष्य ही प्रकृति का अत्यधिक दोहन कर रहा है। इसलिए जल संरक्षण, अधिकाधिक पौधारोपण, प्लास्टिक मुक्त वातावरण तथा बिजली की बचत जैसे छोटे-छोटे प्रयासों को अपनाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि पर्यावरण को बचाना है तो इसकी शुरुआत स्वयं से करनी होगी।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि यह केवल स्कूल नहीं, बल्कि एक विद्यालय है, जो बच्चों के संस्कार निर्माण का मंदिर है। उल्लेखनीय है कि विद्यालय भवन का भूमिपूजन 24 जनवरी को किया गया था और मात्र चार माह के भीतर 5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर इसका लोकार्पण संपन्न हुआ। कार्यक्रम के अंत में अतिथियों एवं विद्यार्थियों ने विद्यालय परिसर में पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया।

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