स्वामित्व योजना के दबाव में जान जोखिम में डालकर काम कर रहे पटवारी, बैतूल में सड़क हादसे में पटवारी की दर्दनाक मौत

स्वामित्व योजना के दबाव में जान जोखिम में डालकर काम कर रहे पटवारी, बैतूल में सड़क हादसे में पटवारी की दर्दनाक मौत

अलसुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक फील्ड में रहने की मजबूरी, लगातार बढ़ते काम के दबाव से पटवारियों में आक्रोश; शासन की महत्वाकांक्षी योजना में ड्यूटी के दौरान असमय काल के गाल में समा रहे कर्मचारी

भोपाल/बैतूल। शासन की महत्वाकांक्षी स्वामित्व योजना के अंतर्गत आबादी भूमि के अधिकार अभिलेख तैयार करने और रजिस्ट्री का कार्य पूरा कराने के लिए प्रदेशभर में पटवारियों पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है। लक्ष्य पूरा करने की जल्दबाजी में पटवारी अलसुबह 7 बजे से लेकर देर रात 9-10 बजे तक फील्ड में रहकर काम करने को मजबूर हैं। इस अत्यधिक कार्यदबाव और लगातार भागदौड़ के बीच अब पटवारियों की सुरक्षा का सवाल भी गंभीर होता जा रहा है। बैतूल जिले में ड्यूटी से लौट रहे एक पटवारी की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत ने पूरे राजस्व अमले को झकझोर दिया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बैतूल जिले के रानीपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम खमालपुर की पुलिया के पास सोमवार को सड़क हादसे में पटवारी कमलेश पिता श्यामू धुर्वे (35 वर्ष), निवासी बरसाली की मौत हो गई। कमलेश धुर्वे की ड्यूटी घोड़ाडोंगरी में थी। सोमवार को वे अपनी ड्यूटी पूरी कर बाइक से वापस घर लौट रहे थे। इसी दौरान खमालपुर पुलिया के पास किसी अज्ञात वाहन ने उनकी बाइक को टक्कर मार दी। गंभीर रूप से घायल पटवारी को तत्काल जिला अस्पताल पहुंचाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

घटना की जानकारी मिलते ही रात में ही उनके साथी पटवारी जिला अस्पताल पहुंच गए। युवा पटवारी की असमय मौत से राजस्व विभाग और पटवारी संघ में शोक के साथ गहरा आक्रोश व्याप्त है। पुलिस ने मर्ग कायम कर मामले की जांच शुरू कर दी है। मंगलवार को पोस्टमार्टम की कार्रवाई की जाना बताया गया है।

स्वामित्व योजना के लक्ष्य ने बढ़ाई पटवारियों की मुश्किलें

इस घटना ने प्रदेश में पटवारियों से कराए जा रहे कामकाज और उनकी कार्य परिस्थितियों पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्तमान में स्वामित्व योजना के अंतर्गत आबादी भूमि की रजिस्ट्री कराने का कार्य तेजी से कराया जा रहा है। इसके लिए पटवारियों को लगातार लक्ष्य दिए जा रहे हैं। स्थिति यह है कि कई क्षेत्रों में पटवारी सुबह 7 बजे से ही फील्ड में निकल जाते हैं और रात 9 से 10 बजे तक काम में जुटे रहते हैं। दिनभर गांवों में सर्वे, दस्तावेजों का मिलान, हितग्राहियों से संपर्क, पोर्टल पर जानकारी दर्ज कराने और रजिस्ट्री संबंधी प्रक्रिया पूरी करने के बाद उन्हें देर रात लंबी दूरी तय कर घर लौटना पड़ता है।

कहीं सड़क हादसे तो कहीं ग्रामीणों की अभद्रता, सुरक्षा पर उठे सवाल 

पटवारियों के सामने चुनौतियां केवल लंबे कार्य समय तक सीमित नहीं हैं। विभिन्न क्षेत्रों से पटवारियों के साथ सड़क दुर्घटनाओं की घटनाएं सामने आ रही हैं। वहीं कुछ स्थानों पर ग्रामीणों द्वारा पटवारियों के साथ अभद्र व्यवहार करने और अन्य गंभीर शिकायतें भी प्राप्त हुई हैं। लगातार बढ़ते काम के दबाव, समय-सीमा में लक्ष्य पूरा करने की बाध्यता और फील्ड में असुरक्षित परिस्थितियों के चलते पटवारियों में नाराजगी बढ़ रही है।

पटवारियों का कहना है कि शासन की महत्वाकांक्षी योजनाओं को जमीन पर सफल बनाने की जिम्मेदारी मैदानी अमले की है, लेकिन इस जिम्मेदारी के निर्वहन में कर्मचारियों के कार्य समय, स्वास्थ्य और सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। देर रात तक काम कराने के बाद लंबी दूरी तक यात्रा करना दुर्घटनाओं की आशंका को बढ़ाता है।

क्या कर्मचारियों की जान से ज्यादा जरूरी है लक्ष्य?

बैतूल के पटवारी कमलेश धुर्वे की मौत ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर योजनाओं के लक्ष्य पूरे कराने की दौड़ में मैदानी कर्मचारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या स्वामित्व योजना जैसी जनहितकारी योजना को सफल बनाने के लिए पटवारियों को लगातार 14-15 घंटे तक काम करना होगा? क्या शासन और प्रशासन की ओर से उनके कार्य समय, सुरक्षित आवागमन और कार्यस्थल पर सुरक्षा के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?

इस घटना को लेकर प्रदेशभर के पटवारियों में आक्रोश और चिंता का माहौल है। पटवारी वर्ग की मांग है कि शासन और प्रशासन कार्य की समय-सीमा तय करने के साथ कर्मचारियों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता दें। रात तक फील्ड में काम कराने की व्यवस्था पर पुनर्विचार हो तथा दुर्घटनाओं और अभद्रता की घटनाओं को गंभीरता से लिया जाए।

स्वामित्व योजना आम नागरिकों को उनकी आबादी भूमि का कानूनी अधिकार दिलाने की महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन इस योजना को सफल बनाने वाले मैदानी कर्मचारियों की जान और सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। कमलेश धुर्वे की असमय मौत ने इस व्यवस्था पर पुनर्विचार की जरूरत को उजागर कर दिया है।


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