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कलेक्टर के फर्जी हस्ताक्षर से जमीन बेचने का बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर, 3 बाबू व 1 दलाल गिरफ्तार

10 दिन की जांच के बाद प्रशासन की बड़ी कार्रवाई, जाली आदेशों के जरिए जमीन बेचने की रची जा रही थी साजिश

मध्यप्रदेश के देवास जिले में कलेक्टर कार्यालय से जुड़ा एक गंभीर फर्जीवाड़ा सामने आया है, जिसमें कलेक्टर के फर्जी हस्ताक्षर और जाली आदेश जारी कर जमीन बेचने की साजिश रची जा रही थी। इस मामले का खुलासा कलेक्टर की सख्ती और सतर्कता के चलते हुआ, जिसके बाद बीएनपी थाना पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 3 बाबुओं और 1 दलाल को गिरफ्तार कर लिया।

जानकारी के अनुसार, आरोपियों ने सरकारी प्रक्रिया का गलत फायदा उठाते हुए फर्जी दस्तावेज तैयार किए। इन दस्तावेजों पर कलेक्टर के नकली हस्ताक्षर किए गए थे, ताकि उन्हें असली दिखाकर जमीन की खरीदी-बिक्री की जा सके। यह पूरा नेटवर्क सुनियोजित तरीके से काम कर रहा था और आम लोगों को ठगने की फिराक में था।

मामले की शुरुआत तब हुई जब कलेक्टर कार्यालय को कुछ संदिग्ध आदेशों की जानकारी मिली। प्रारंभिक जांच में ही दस्तावेजों में गड़बड़ी पाई गई, जिसके बाद विस्तृत जांच के आदेश दिए गए। करीब 10 दिनों तक चली जांच में यह स्पष्ट हो गया कि कुछ कर्मचारी और बाहरी व्यक्ति मिलकर इस फर्जीवाड़े को अंजाम दे रहे थे।जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने अलग-अलग मामलों में जाली कागजात तैयार कर कई लोगों की जमीन बेचने या हड़पने का प्रयास किया। इस दौरान सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर करने की भी कोशिश की गई, जिससे पूरे प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़े हो गए हैं।

पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया है। फिलहाल सभी आरोपियों से पूछताछ जारी है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस गिरोह में और कौन-कौन लोग शामिल हैं।

आरोपियों के नाम:

एक रजिस्ट्री के दौरान दस्तावेजों पर शक होने पर जब कलेक्टर ऋतुराज सिंह ने जांच बैठाई, तो इस पूरे काले खेल का भंडाफोड़ हो गया। बीएनपी पुलिस ने चारों आरोपियों संजीव जाटव, रमेश लोबानिया, जितेंद्र भद्रे और दलाल महेंद्र कुशवाह को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया है।

प्रशासन की प्रतिक्रिया:

जिला प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा है कि दोषियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कलेक्टर कार्यालय में दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया को और मजबूत किया जाएगा।

यह मामला न केवल एक बड़े फर्जीवाड़े को उजागर करता है, बल्कि सरकारी दफ्तरों में पारदर्शिता और निगरानी की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। प्रशासन की समय पर कार्रवाई से एक बड़ा घोटाला होने से बच गया।

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