आर्यिका माताजी ने जैन धर्म के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए बताया कि जल में असंख्यात जीव होते हैं जो लघु ओर सूक्ष्म होते है जिन्हें सीधे आंखों से देखा नहीं जा सकता है । इसे वैज्ञानिकों ने भी प्रमाणित किया है, इसलिए जैन परंपरा में जल को छानकर और उबालकर उपयोग में लाने की परंपरा है, जिससे सूक्ष्म जीवों की रक्षा हो सके।
उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए जल संरक्षण को अत्यंत आवश्यक बताते हुए समाज के प्रत्येक व्यक्ति से अपील की कि वे जल के प्रति संवेदनशील बनें और इसके संरक्षण की दिशा में सक्रिय योगदान दें। इससे जहां त्रस जीवों की रक्षा होगी वहीं हमारे धर्म का पालन होगा ओर हम निष्प्रयोजन एक इंद्री जीवों की हत्या के पाप से बचेंगे ।
इस अवसर पर जैन समाज के लोगों को पानी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष उपकरण “वॉटर बेल सायरन” भी वितरित किए गए, जिन्हें पानी की टंकियों में लगाया जाएगा। इन उपकरणों के माध्यम से टंकी भरने पर संकेत मिल जाएगा, जिससे पानी का अनावश्यक बहाव रोका जा सकेगा और जल का अपव्यय नहीं होगा।कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे और सभी ने माताजी के संदेश को आत्मसात करते हुए जल संरक्षण का संकल्प लिया।

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