“जल-जंगल-जमीन की जंग”: तपती धूप में आदिवासियों का हुंकार, मोरण्ड-गंजाल परियोजना के खिलाफ हरदा कलेक्ट्रेट की ओर पैदल कूच

“जल-जंगल-जमीन की जंग”: तपती धूप में आदिवासियों का हुंकार, मोरण्ड-गंजाल परियोजना के खिलाफ हरदा कलेक्ट्रेट की ओर पैदल कूच

कलेक्टर ने रास्ते में लिया ज्ञापन, आश्वासन पर लौटे आदिवासी ग्रामीण

हरदा (सार्थक जैन) । जिले में प्रस्तावित मोरण्ड-गंजाल सिंचाई परियोजना अब सिर्फ एक विकास योजना नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन की अस्मिता की लड़ाई बनती जा रही है। शुक्रवार को रहटगांव क्षेत्र से सैकड़ों आदिवासी ग्रामीणों ने भीषण गर्मी को चुनौती देते हुए अपने हक की रक्षा के लिए कलेक्ट्रेट तक पैदल मार्च किया।

वनग्राम बोथी सहित आसपास के गांवों से निकले पुरुष, महिलाएं और बुजुर्ग हाथों में तख्तियां और दिल में आक्रोश लिए सड़कों पर उतरे। “जंगल, जमीन हमारा अधिकार है” और “आदिवासियों को उजाड़ना बंद करो” जैसे नारों से पूरा रास्ता गूंज उठा।

“जमीन नहीं छोड़ेंगे, चाहे कुछ भी हो”

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इस परियोजना के चलते 20 से 25 गांवों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। आदिवासी परिवारों को अपने पुश्तैनी घर और जंगल छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जबकि पुनर्वास को लेकर कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं की गई है। ग्रामीणों का दो टूक कहना है—जंगल ही उनका जीवन, संस्कृति और पहचान है, जिसे वे किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे।

संगठनों का साथ, बढ़ता जनआक्रोश

इस आंदोलन को जयस आदिवासी युवा शक्ति सहित कई संगठनों का समर्थन मिला, जिससे विरोध और भी तेज हो गया। करीब 200 से अधिक ग्रामीणों ने संगठित रूप से यह पदयात्रा शुरू की, जिसका उद्देश्य साफ था—परियोजना का विरोध और विस्थापन पर रोक।

कलेक्ट्रेट से पहले ही प्रशासन ने रोका काफिला

जानकारी के अनुसार, प्रदर्शनकारी हरदा के पास तारा वेयरहाउस तक पहुंच चुके थे, जहां कलेक्टर सिद्धार्थ जैन स्वयं मौके पर पहुंचे। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से चर्चा कर ज्ञापन लिया और उचित कार्रवाई का आश्वासन देते हुए समझाइश दी।

कलेक्टर ने कहा कि आदिवासियों की चिंताओं को दूर करने के लिए संबंधित अधिकारियों और प्रतिनिधियों की बैठक कर समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रदर्शनकारियों की मांगें संबंधित विभाग तक पहुंचा दी जाएंगी।

आंदोलन उग्र होने की चेतावनी

आदिवासी नेताओं ने साफ चेतावनी दी है कि यदि परियोजना को रद्द नहीं किया गया या विस्थापन का संतोषजनक समाधान नहीं निकाला गया, तो यह आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है।


आदिवासी नेता राकेश काकोरिया ने आरोप लगाया कि यह योजना आदिवासियों की जमीन छीनने का जरिया बन रही है, जबकि जय उइके ने कहा कि केवल मुआवजे की बात हो रही है, लेकिन पुनर्वास की कोई ठोस योजना सामने नहीं आई है।अब सबकी निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं—क्या समाधान निकलेगा या यह “जमीन बचाने की जंग” और भड़क उठेगी।


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