बताया जा रहा है कि लगातार मीटिंग और अचानक दिए गए आदेशों के दबाव के कारण पटवारियों को बिना समय और परिस्थिति की परवाह किए दौड़भाग करनी पड़ती है। मूल रूप से राजस्व और भू-अभिलेख का कार्य देखने वाले पटवारियों को अब VIP ड्यूटी, आयोजन प्रबंधन, खाद वितरण और अन्य गैर-राजस्व कार्यों में झोंक दिया गया है।
छुट्टियों और निजी जीवन का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। शनिवार-रविवार और त्योहारों पर भी मीटिंग और आदेशों का सिलसिला जारी रहता है, जिससे कर्मचारियों में मानसिक तनाव और अवसाद बढ़ता जा रहा है।
सहकर्मियों का कहना है कि यदि इस तरह का दबाव न होता, तो शायद यह हादसा टल सकता था। यह घटना न केवल एक परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती है—क्या कर्मचारियों की जान से ज्यादा जरूरी है अनियमित और अव्यवस्थित कार्यप्रणाली? इस घटना को लेकर पटवारियों में आक्रोश पनप रहा है जो कि कभी भी आंदोलन का रूख अख्तियार कर सकता है । अब मांग उठ रही है कि कार्य व्यवस्था में सुधार किया जाए ताकि भविष्य में इस तरह की दुखद घटनाओं को रोका जा सके।

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