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आध्यात्मिक शिविर में गूंजा आत्म-कल्याण का स्वर, पंडित सुमतप्रकाश ने बताया सुखी होने का अचूक मार्ग


हरदा। स्थानीय एलआईसी ऑफिस के समीप स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन चैत्यालय में आयोजित दो दिवसीय 'आध्यात्मिक जीवन उपयोगी शिविर' आध्यात्मिक ऊर्जा और आत्म-मंथन के साथ संपन्न हुआ। २८ और २९ अप्रैल को आयोजित इस विशेष शिविर में खनियाँधना के ख्यातिप्राप्त आत्मरसिक विद्वान बाल ब्र. पंडित सुमतप्रकाश के मंगल सान्निध्य में नगर के धर्मप्रेमियों ने आत्म-ज्ञान की गंगा में डुबकी लगाई।

दो दिनों तक चले इस शिविर में कुल चार सत्रों के माध्यम से लगभग ५०-६० जिज्ञासुओं ने प्रत्यक्ष रूप से जुड़कर धर्म लाभ लिया। शिविर का मुख्य उद्देश्य वर्तमान भागदौड़ भरी जिंदगी में मानसिक तनाव को दूर कर वास्तविक सुख की प्राप्ति करना था।

सुख के नाम पर हम दुःख ही भोग रहे हैं: पं.सुमतप्रकाश

अपने ओजस्वी और सारगर्भित प्रवचनों में पंडित सुमतप्रकाश जी ने जीवन के उस मर्म को छुआ, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। उन्होंने कहा कि "आज का मनुष्य सुख की खोज में दर-दर भटक रहा है, लेकिन वास्तव में जिसे वह सुख समझ रहा है, वह मात्र कम दुःख की स्थिति है। हम सुख के नाम पर केवल दुःख ही बटोर रहे हैं।" उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे चिलचिलाती धूप से निकलकर छाँव में बैठने पर जो राहत मिलती है, वह असली सुख नहीं बल्कि धूप के दुःख की कमी है। वास्तविक सुख तो आत्मा का स्वभाव है, जो बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता।

प्रयत्न नहीं, सही समझ है सुख का आधार

शिविर के दौरान गुरुजी ने स्पष्ट किया कि सुखी होने के लिए दुनिया को बदलने या बहुत अधिक शारीरिक प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा, "सच्ची समझ का नाम ही सुख है। सुखी होने के लिए प्रयत्न नहीं करना है, बल्कि केवल 'वस्तु के स्वभाव' को मात्र समझना है। जैसे ही हम किसी वस्तु या परिस्थिति को उसके वास्तविक रूप में जान लेते हैं, उसे बदलने का भाव (परिवर्तन का भाव) स्वतः समाप्त हो जाता है। और जहाँ चाह मिटी, वहीं सुख का उदय हो जाता है।"

गृहस्थ जीवन में सुख का सूत्र: 'अपेक्षा' और 'हस्तक्षेप' का त्याग

घर-परिवार में रहते हुए कैसे शांत और प्रसन्न रहा जाए, इस पर गुरुजी ने व्यवहारिक और सटीक मार्गदर्शन दिया। उन्होंने समझाया कि हमारे दुखों का सबसे बड़ा कारण दूसरों से 'अपेक्षा' रखना और उनके कार्यों में 'हस्तक्षेप' (Interference) करना है। पंडित जी ने कहा, "जब हम दूसरों को अपने अनुसार चलाने की कोशिश करते हैं, तो क्लेश उत्पन्न होता है। दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप न करना ही वास्तविक सुख है। यदि हम केवल ज्ञाता-दृष्टा बनकर रहें और यह स्वीकार करें कि हर व्यक्ति अपनी योग्यता से जी रहा है, तो घर ही स्वर्ग बन सकता है।"

श्रद्धालुओं में दिखा भारी उत्साह

शिविर के समापन पर उपस्थित ५०-६० साधर्मियों ने गुरुजी के प्रति आभार व्यक्त किया। प्रतिभागियों का कहना था कि इन दो दिनों में उन्हें जीवन जीने का एक नया नजरिया मिला है। कार्यक्रम के अंत में मंदिर समिति द्वारा गुरुजी का बहुमान किया गया। सभी उपस्थित जनों ने संकल्प लिया कि वे गुरुजी द्वारा बताए गए सिद्धांतों को अपने दैनिक जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे।

इस आध्यात्मिक आयोजन ने न केवल जैन समाज बल्कि हरदा के हर उस व्यक्ति को प्रेरित किया जो मानसिक शांति और जीवन के असली उद्देश्य की तलाश में है। शिविर के सफल आयोजन में स्थानीय युवा मंडल और समस्त जैन समाज का सराहनीय सहयोग रहा।

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