जानकारी के मुताबिक, फिरोजा खातून जेल में वारंट इंचार्ज का कार्य संभालती थीं, जबकि धर्मेंद्र सिंह जेल के भीतर वारंट से जुड़े काम में लगाया गया था। फाइलों और वारंटों के बीच शुरू हुई बातचीत कब भावनाओं में बदल गई, शायद इसकी एंट्री किसी जेल रजिस्टर में दर्ज नहीं हो पाई। उम्रकैद की सजा पूरी कर करीब चार साल पहले रिहा हुए धर्मेंद्र ने आखिरकार जेल से बाहर आकर रिश्ते को “स्थायी जमानत” दिला दी।
बताया जा रहा है कि फिरोजा खातून के मुस्लिम परिजन इस रिश्ते से नाराज रहे और विवाह में शामिल नहीं हुए। ऐसे में विश्व हिंदू परिषद के जिला उपाध्यक्ष राजबहादुर मिश्रा ने सपत्नीक माता-पिता की भूमिका निभाते हुए कन्यादान कराया। विवाह में बजरंग दल के कार्यकर्ता भी मौजूद रहे।
इस विवाह ने समाज में कई सवाल भी खड़े किए हैं। एक ओर लोग इसे “प्रेम की जीत” बता रहे हैं, तो दूसरी ओर चर्चा इस बात की भी है कि जेलें अब केवल सुधारगृह रह गई हैं या “रिश्ता निर्माण केंद्र” भी बनती जा रही हैं। हालांकि कानून और समाज की तमाम बहसों के बीच यह तय है कि इस शादी ने लोगों को चौंकाने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर कर दिया है।

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