न्यास कॉलोनी स्थित महावीर परिसर में प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने कहा कि समय कभी रुकता नहीं है। गत वर्ष उन्हें जबलपुर में वर्षायोग का अवसर मिला। वहां से पैदल विहार करते हुए वे मुक्तागिरि पहुंचे, सिद्ध क्षेत्र की वंदना की और फिर नागपुर जाकर ग्रीष्मकाल स्वाध्याय में व्यतीत किया। इसके बाद मुनि संघ विहार करते हुए बैतूल पहुंचा। बैतूल से आगे जाने का सीधा मार्ग होने के बावजूद इटारसी के श्रावकों और यहां वर्षायोग कर रहे आर्यिका संघ की प्रबल भावना को स्वीकार करते हुए वे सहज भाव से पैदल विहार कर इटारसी पहुंचे।
आचार्यश्री ने कहा कि चातुर्मास के चार महीने आत्मसाधना, धर्म-ध्यान और आत्मचिंतन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। मनुष्य जीवन साधना के लिए मिला है और इसका सदुपयोग आत्मकल्याण में करना चाहिए। उन्होंने आचार्य विद्यासागर महाराज का स्मरण करते हुए कहा कि कलिकाल में उनके समान तप, त्याग और साधना का उदाहरण दुर्लभ है।
उन्होंने कहा कि साधना के समय बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं और समय के साथ भीड़ चली जाती है, लेकिन गुरुदेव विद्यासागर महाराज हमेशा यह संदेश देते थे कि "भीड़ में रहते हुए भी अपने नीड़ अर्थात आत्मतत्व को कभी मत भूलो।" यही आत्मजागरण का वास्तविक मार्ग है।
आचार्य समयसागर महाराज ने कहा कि यद्यपि गुरुदेव विद्यासागर महाराज अब भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आगम की दृष्टि से संयोग और वियोग जीवन का स्वाभाविक क्रम है। उनके प्रति सच्ची श्रद्धा रखने वाले प्रत्येक भक्त के हृदय में गुरुदेव आज भी विराजमान हैं। उनका निरंतर स्मरण और आराधना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
प्रवचन से पूर्व सोमवार को आचार्य समयसागर महाराज एवं मुनि संघ के पांच साधुओं ने केशलोंच कर उपवास रखा। सायंकाल गोधूलि बेला में गुरुभक्ति का आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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