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जैन संतों की पिच्छी पर अभद्र टिप्पणी का मामला: मेनका गाँधी को 1 करोड़ रुपए का कानूनी नोटिस, जैन समाज में भारी आक्रोश


पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गाँधी द्वारा जैन संतों के परम पवित्र धार्मिक उपकरण पिच्छी (मोरपंख से निर्मित) को लेकर दिए गए एक अत्यंत गैर-जिम्मेदार, भ्रामक और अमर्यादित बयान ने देश-विदेश में निवास करने वाले करोड़ों जैन धर्मावलंबियों की भावनाओं को गहरे रूप से आहत किया है।जैन समाज की मान्यताओं और अहिंसा के मूल सिद्धांतों के प्रति उनकी घोर अज्ञानता को उजागर करने वाले इस बयान के विरोध में अब कानूनी मोर्चा खोल दिया गया है।

​23 जून को मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) के प्रतिष्ठित विधिक अधिवक्ता निपुण जैन के माध्यम से सकल दिगंबर जैन समाज, जैन युवा संगठन, और श्री णमोकार महामंत्र समिति सहित समाज के 22 से अधिक गणमान्य व्यक्तियों एवं संस्थाओं ने मेनका गाँधी को एक विस्तृत 10-पृष्ठीय कानूनी (लीगल) नोटिस प्रेषित किया है।

क्या था मेनका गाँधी का बयान और क्यों है यह उनकी अज्ञानता का प्रमाण

​प्रस्तुत विधिक नोटिस के अनुसार, हाल ही में दिगंबर जैन संत आचार्य श्री सौरभ सागर महाराज के दिल्ली प्रवास के दौरान मेनका गाँधी ने जैन मुनिराजों द्वारा प्रयुक्त होने वाली पिच्छी के संबंध में सार्वजनिक रूप से यह निंदनीय आरोप लगाया था कि जैन समाज द्वारा लाखों मोरों की हत्या करके उनके पंख प्राप्त किए जाते हैं और उन्हीं पंखों से पिच्छी बनाई जाती है।उन्होंने लगभग 15 लाख मोरों की हत्या का सनसनीखेज और निराधार आरोप मढ़ दिया था।लेकिन मेनका गांधी का ​यह वक्तव्य न केवल पूर्णतः असत्य और तथ्यहीन है, बल्कि जैन धर्म के प्रति मेनका गाँधी की गंभीर अज्ञानता को भी प्रदर्शित करता है। संपूर्ण विश्व जानता है कि जैन धर्म की आधारशिला अहिंसा परमो धर्मः के सिद्धांत पर टिकी है।जैन साधु-संत सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों की रक्षा और कल्याण का संकल्प लेकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

​यह सर्वविदित एवं परंपरागत शाश्वत तथ्य है कि जैन मुनियों की पिच्छी जिन मोरपंखों से निर्मित होती है, वे मोरपंख मोरों द्वारा प्राकृतिक रूप से समय-समय पर स्वयं झाड़ (शेड) दिए जाते हैं, जिन्हें पतित मोरपंख कहा जाता है।जैन धर्म की मान्यताओं में किसी भी जीव को लेशमात्र भी कष्ट पहुँचाना या उसकी हत्या करना पूर्णतः निषिद्ध है।बिना किसी वैज्ञानिक अध्ययन, विधिक आधार या प्रामाणिक साक्ष्य के ऐसा घिनौना आरोप लगाना केवल भ्रम फैलाने और जैन समाज की सामाजिक-धार्मिक प्रतिष्ठा को धूमिल करने का दुर्भावनापूर्ण प्रयास है।

नोटिस में की गई मुख्य मांगें और 1 करोड़ रुपये का हर्जाना : ​अधिवक्ता निपुण जैन के माध्यम से भेजे गए इस विधिक नोटिस में मेनका गाँधी को स्पष्ट चेतावनी देते हुए 15 दिनों के भीतर जिन मांगों को पूरा करने का निर्देश दिया गया है,उनमें

नोटिस प्राप्ति के 15 दिनों के भीतर वे अपने इस असत्य एवं भ्रामक बयान को पूर्णतः और बिना शर्त वापस लें।राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बिना किसी शर्त के सार्वजनिक रूप से लिखित व वीडियो माध्यम से देश की जनता और जैन समाज से माफी मांगें।जैन धर्म, जैन साधु-संतों और समाज के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को असत्य, तथ्यहीन और आधारहीन स्वीकार करते हुए सार्वजनिक स्पष्टीकरण जारी करें।

एक करोड़ रुपये की मानहानि क्षतिपूर्ति: जैन समाज की सामाजिक प्रतिष्ठा, धार्मिक सम्मान और छवि को पहुँचाई गई अपूरणीय क्षति के लिए एक करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति राशि का अधिकार सुरक्षित रखा गया है।

​विशेष रूप से, समाज ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि यह क्षतिपूर्ति राशि प्राप्त होती है, तो इसका उपयोग किसी निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रहित, जीव-दया, पर्यावरण संरक्षण, पक्षी संरक्षण, अहिंसा प्रचार, गौ-सेवा और धार्मिक-सांस्कृतिक संवर्धन जैसे लोकहितकारी कार्यों में किया जाएगा।

अन्यथा होगी कठोर कानूनी कार्रवाई : नोटिस में साफ तौर पर आगाह किया गया है कि यदि तय समयावधि (15 दिवस) के भीतर इन मांगों का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो मेनका गाँधी के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता 2023 की प्रासंगिक धाराओं के अंतर्गत धार्मिक भावनाओं को आहत करने, विभिन्न वर्गों के मध्य वैमनस्य उत्पन्न करने, मानहानि करने तथा लोकशांति भंग करने की श्रेणी में सक्षम न्यायालय में दीवानी एवं आपराधिक विधिक कार्यवाही संस्थित की जाएगी, जिसके समस्त व्यय और परिणामों के लिए वे स्वयं उत्तरदायी होंगी।​इस नोटिस के प्रेषित होने के बाद से संपूर्ण जैन समाज एकजुट है और सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर तक मेनका गाँधी के इस अज्ञानतापूर्ण व गैर-जिम्मेदाराना रवैये की तीव्र भर्त्सना कर रहा है।

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