मामला एक किसान की जमीन के सीमांकन से जुड़ा था। तुकेड़ा गांव निवासी किसान रामखिलाड़ी सिंह चौहान कई दिनों से अपनी जमीन के सीमांकन के लिए पटवारी के चक्कर काट रहा था। लेकिन सरकारी प्रक्रिया के तहत काम करने के बजाय पटवारी लगातार रिश्वत की मांग कर रहा था।
जानकारी के अनुसार आरोपी पटवारी ने पहले सीमांकन के एवज में 10 हजार रुपये मांगे। किसान ने कई बार बिना रिश्वत काम करने की बात कही, लेकिन पटवारी अपनी मांग पर अड़ा रहा। बाद में सौदेबाजी करते हुए रिश्वत की रकम 10 हजार से घटाकर 8 हजार रुपये कर दी गई और इसे दो किस्तों में लेने की योजना बनाई गई।
सरकारी कर्मचारियों द्वारा इस तरह किश्तों में रिश्वत लेने की प्रवृत्ति यह दर्शाती है कि भ्रष्टाचार अब कितनी गहराई तक फैल चुका है। आम नागरिकों को उनके वैधानिक अधिकार दिलाने के बजाय उनसे सौदेबाजी की जा रही है। किसान, मजदूर और आम लोग सरकारी दफ्तरों में काम कराने के लिए मजबूरी में रिश्वत देने को विवश हो रहे हैं।
परेशान किसान ने आखिरकार 15 मई 2026 को ग्वालियर लोकायुक्त कार्यालय पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के बाद लोकायुक्त टीम ने जांच शुरू की और रिश्वत मांगने की बातचीत का ऑडियो रिकॉर्ड किया गया। शिकायत सही पाए जाने पर लोकायुक्त ने जाल बिछाया।
तय योजना के अनुसार बुधवार को शिकायतकर्ता कैडबरी फैक्ट्री के पास आरोपी पटवारी को पहली किस्त के रूप में 6 हजार रुपये देने पहुंचा। लोकायुक्त टीम ने पहले ही नोटों पर विशेष केमिकल लगाया हुआ था। जैसे ही पटवारी ने पैसे हाथ में लिए, पहले से तैनात टीम ने उसे मौके पर ही पकड़ लिया। बाद में हाथ धुलवाने पर केमिकल रिएक्शन पॉजिटिव मिला, जिससे रिश्वत लेने की पुष्टि हो गई।
यह कार्रवाई लोकायुक्त डीएसपी विनोद कुशवाह के नेतृत्व में करीब 12 सदस्यीय टीम ने की। आरोपी पटवारी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जा रही है।
यह घटना एक बार फिर सवाल खड़े करती है कि आखिर कब तक सरकारी दफ्तरों में आम लोगों को अपने ही अधिकारों के लिए रिश्वत देनी पड़ेगी। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कार्रवाई के साथ-साथ प्रशासनिक जवाबदेही भी जरूरी हो गई है।

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