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साधु-संत विश्व की धरोहर : उपाध्याय विशेषसागर

हरदा। सभी धर्मो में गुरु की महिमा का वर्णन किया गया है गीता ग्रंथ में गुरु शब्द को महामंत्र कहा गया है । गुरु याने हितैषी शुभ चिंतक, मार्ग दर्शक, उपकारक, कहा जाता है जिसके जीवन में गुरु नहीं उसका जीवन शुरू नहीं, गुरु के बिना व्यक्ति मन का राजा हो जाता हम जो कह रहे वही सहि है, हम जो कर रहे वहीं सहि है उक्त उद्गार प.पू.विराग किर्ती,वात्सल्य शिरोमणी उपाध्याय श्री १०८ विशेषसागर जी गुरुदेव ने हरदा में धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहे।

पू . उपाध्याय श्री ने आगे भारत को संतों की भूमि कहा है, यहाँ कहावत है साधु संत येती घरा तोची दिवाली दशहरा ,साधु-संत विश्व की धरोहर है, जिस समाज में साधु संतों का आदर-सत्कार होता है वहाँ हरियाली - खुशहाली रहता है। दिगम्बर संत त्याग-तपस्या की साक्षात मुर्ति होते हैं, घन दौलत के त्यागी होते है, अपने पास पिच्छि- कमण्डल व आवश्यक शास्त्र ही रखते है, गर्मी में ए. सी. कूलर, पंखा आदि व सर्दी में रुम हिटर आदि का प्रयोग नहीं करते। दिन में एक बार ही कर पात्र में शुद्ध आहार लेते हैं, चौके में स्वाद का नहीं शुद्धि का ध्यान रखते है, संत स्वोपकार के साथ परोपकार की भावना रखते है, समाज में कैंची का नहीं सुई का कार्य करते है, समाज को जोड़ने की बात करते है, पंथवाद, संतवाद की नहीं आगम की बात करते है, पंथवाद-संतवाद- व्यक्ति को संसार भ्रमण कराता आगमानुसार चलने वाला एक दिन संसार से पार होता है।

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